वैसे एक बात है। मन को जहां भी लगाएं उसी वस्तु का उत्कर्ष हो जाता है। मन को व्यर्थ की दूसरों की बातों में लगाएं, इसी का उत्कर्ष हो जाता है। मन को आलस्य में लगाएं रखे, आलस्य का ही उत्कर्ष होता जाता है। मन को किसी विषय के अध्ययन में लगाए रखें, उस विषय का उत्कर्ष हो जाता है।

उत्कर्ष हो जाता है मतलब हमारे जीवन में उसका उत्कर्ष हो जाता है। उसमें प्रगति हो जाती है। वह नई ऊंचाइयों को छूने लगता है। या उसका विकास हो जाता है।

मन को काम में लगाएं और लगाए रखें, तो इसका भी उत्कर्ष हो जाता है। इसके उत्कर्ष से हमारा उत्कर्ष होगा या नहीं वह अलग बात है। परन्तु इसका तो उत्कर्ष हो ही जाता है।

इसलिए समझ में आता है की मन तो बहुत शक्तिशाली है। या कारगर उपकरण है। चाहे बुरी वस्तु हो या अच्छी, इसका काम है उत्कर्ष कर देना।

अब कोई निठल्ले व्यक्ति ही जो कहीं मन को लगाते ही नहीं बस सोते रहते हैं या आराम करते रहते हैं, वे ही इस बात को नहीं मानेंगे बाकी तो सब मानेंगे। वैसे इन लोगों का भी निठल्ला पना मन ही ने दृढ़ किया है। क्योंकि ये उसका ही अभ्यास करते चले गए।

इसलिए मन को अच्छी क्रिया में यदि लगाया जाए, जो क्रिया हमारा भला करने वाली हो, तो मन उसका उत्कर्ष करके हमें कहीं से कहीं पहुंचा सकता है।